Sunday 22 January 2012

म्हारी साख
रात तो
काल भी ही
आज भी है
काल भी रै सी
पण
बात नीं रै सी।
अंधारो हो सी
काल भी
आज भी
चानणै री
रै सी उडीक
मिटसी कद।

दिन रात बिचाळै
भंवसी सबद
सबद बिलाइजसी
अरथाइजसी
मिटसी दिन-रात
खूटसी अरथ
छूटसी बात
गम ई जासी सबद
कुण भर सी साख

म्है हूं
पण म्हारी भी
कुण भरसी साख?

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