Thursday 19 January 2012

मेरे घर में......

मेरे घर में

र्इंटे पक्की हैं,

रिश्ते थोड़ी है

... जो टूट जाएंगे।

पत्थर हंै

संगमरमर के

विश्वास थोड़ी है

जो डिगे गा नहीं।

चूना है

रंग-बिरंगा

यादें थोड़ी हैं

जो फीकी पड़ जाएंगी।

मजबूत है यदि

रिश्ते, विश्वास और यादें

इंटें, पत्थर और चूने से

तो क्यों कोई इंसान

नहीं है

मेरे घर में।

1 comment:

  1. बहुत अच्छी कविता है।
    "तो क्यों कोई इंसान

    नहीं है

    मेरे घर में।"

    बात समझ नहीं आई !

    ReplyDelete

There was an error in this gadget