Saturday 9 June 2012

INDIRA GHANDHI NEHER JARJAR


Saturday 14 April 2012

Sunday 22 January 2012

म्हारै घर में

म्हारै घर में
पक्की है ईंटां
रिस्ता कोनीं
जका टूट जासी
पत्थर है
भाठा है
मंजियै रा
बिसवास थोड़ी है
जका डिग जासी

चूनो है
रंग-बिरंगो
ओळ्यूं कोनीं
जकी
मोळी पड़ जासी।

जे कर है मजबूत
रिस्ता-विसवास
लूंइी ओळ्यूं
ईंट
भाठा अर चूनै सूं
तो पछै
मिनख क्यूं नीं
म्हारै घर में
बा सूं मजबूत।

घर

ढोईजणों ई हो
घर माणस रो
कांई मोल आटै आगै
कोरै छाणस रो।
घर
क्यां रो घर हो
ईंटां ही राड़ री
चूनो हो सुवारथ रो
भाठा हा बुराई रा
माणस ई कठै हा
डेरा हा कसाई रा।
साची बता
कठै हीं नींव
प्रीत री
खाई ही रीत री
कठै हा
सैं थीर निग्गर
जाबक थोथा हा
माणस ई मोथा हा।
कियां ढबतो घर
जकै में रैवंतो डर
हरमेस पड़ण रो
चौखो होयो
जे पड़ग्यो घर।

कीं कर

चावै
हांस थूं
बैठ ना
जाबक अणबोल्यो
थम ना
भलांई मार हांफळा
बिगड़ ना
भलांई बण ना।
कीं तो कर
पण डर ना
ऊंची राख नस
बस।

गांधी बाबा

गांधी बाबा
राम-राम
थां रा दरसण
म्हानै भावै
थूं ई छप-छप
नोटां में आवै
थारा गुण
बोटां में गावै
थूं ई राम
थूं ई रहीम
थूं ही ईसा
थूं ई खुदा
पण थारा अंदाज
भोत जुदा
थां री फोटू
जेब में
राजी सारा
सगळी ऐब में।
थां रो नाम
काढै काम
धरणों लागै
थारै घाट
नेता भोगै
पूरा ठाट।

थारी टोपी
राजनीति टोपी
राजनीति री
गोपा-गोपी
नेता नाचै
कर-कर कोपी।

जुध दर जुध

जुध दर जुध
म्है
जद बी सोचूं
भेजै में चालै
जुध दर जुध
म्हारै अर म्हारै सोच में
कदै ई
आडा आवै सिद्धांत
कदै ई मनगत
कदै ई दुनियादारी

म्हैं तो
हरमेस ई हार्यो
कदै ई मन आगै
कदै ई थां आगै
कदै ई दुनियां आगै।
आज ठाह पड़ी
भोत दोरो है जीवणों
आपरी सोच साथै
आपरै ई लोगों बिचाळै।
दादो जी
दादो जी री दुनियां
चालती गेडियै पाण
बगती राणों-राण
पण
जित्ते हा दादो जी
बित्तै हो गेडियो।
उठतां-बैठतां
बगतां-ढबतां
उणां रै
साथै ई बगतो गेडियो
हाथां में
का पछै मांचै सा रै।
जापतो भी राखता
पूरो-पूरो
जतन करता
गेडियौ रा
तेल चौपड़'र राखता
टाबर रै गा'ल उनमान।
उणरी मनगत
बगती गेडियै साथै
जे टाबर करतो
अणसुनी-अणकथी
नीं रैवंतो हाथै-बाथै
दिखावंता गडियो
अर टाबर सरणै।
घर दरबर
गळी दर गळी
भंवता दादो जी
गेडियै चढ्या
करता गांवतरो
कोठै सूं बरसाळी
बरसाळी सूं कोटड़ी
गेडियै पाण
गेला पड़ता ओछा
डंगर ई जाणता
बां रै गेडियै री
भासा।
म्हारी साख
रात तो
काल भी ही
आज भी है
काल भी रै सी
पण
बात नीं रै सी।
अंधारो हो सी
काल भी
आज भी
चानणै री
रै सी उडीक
मिटसी कद।

दिन रात बिचाळै
भंवसी सबद
सबद बिलाइजसी
अरथाइजसी
मिटसी दिन-रात
खूटसी अरथ
छूटसी बात
गम ई जासी सबद
कुण भर सी साख

म्है हूं
पण म्हारी भी
कुण भरसी साख?
भिस्टवाड़ो
हर जाग्यां है भिस्टवाड़ो
सारै जग में है
हरेक री रग-रग में है
साग में भेळी मिरच में है
भगवान रै भोग में
पुजारी री दखणां में है

रेल-बस री टिगट में
सीट लेवण में
अठै तांईं कै
काम सरु करण सूं लेय र
निवेड़ण तांईं में भिस्टवाड़ो
अब तो
मोह में भी है
प्रीत में है
बिछोडै़ में है
पड़तख भिस्टवाड़ो।
आजादी
म्हे तो उडाया
मनां कनां
स्याणप सूं
धोळिया कबूतर
स्यांति अर संपत सारु।
थे तो
मार ई काढ्या।
म्हे तो
होया कुरबाण
थांरी आजादी सारु
थां रोपी
म्हारी मूरत्यां
घाली माळा
म्हारै गळे में
होग्या आजाद
अब उजाड़ो घर
निरबळां रो
म्हे तो नीं दियो
इत्तो भुजबळ
इत्ती आजादी
फेर थे
इयां कियां होग्या
इत्ता आजाद?

Thursday 19 January 2012

मेरे घर में......

मेरे घर में

र्इंटे पक्की हैं,

रिश्ते थोड़ी है

... जो टूट जाएंगे।

पत्थर हंै

संगमरमर के

विश्वास थोड़ी है

जो डिगे गा नहीं।

चूना है

रंग-बिरंगा

यादें थोड़ी हैं

जो फीकी पड़ जाएंगी।

मजबूत है यदि

रिश्ते, विश्वास और यादें

इंटें, पत्थर और चूने से

तो क्यों कोई इंसान

नहीं है

मेरे घर में।

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