Monday 1 August 2011

ओ क्यां रो समाज है?
रीपियां रै खातिर खूंद काडै
भाई-भाई ने बाडै
ओ क्यां रौ समाज है?
नोट है तो भर्ती करवाओ
नीं तो मरीज नै घरै ली आओ
ओ क्यां रो इलाज है?
योजना शुरू होणै सूं पैली थमगी
दफ्तर रै कागदां में गमगी
ओ क्यां रो आगाज है?
खरीदण गया तो अंटी फाटगी
पोषाहार नै सूंडी चाटगी
ओ क्यां रो अनाज है?

Monday 9 May 2011

पाप की हांडी
बेईमानी की आंच
झूठ का तड़का
मिलते ही
जो लेते हैं आकार
...मानो पक गया भ्रष्टाचार
किसान का पसीना
बनिये की बही
जब लेती है डकार
मानो पक गया भ्रष्टाचार
नेता की टोपी
पुलिस का डंडा
जब मिलते हैं
तो ईमानदारी को धिक्कार
मानो पक गया भ्रष्टाचार
दादो जी रो गेडिय़ो
दादो जी हा
जद ई दिखतो गेडिय़ो ।
उठतां, बगतां तो
बां रै सागै रैंवतो गेडिय़ो ।
...पलंग रै सारै
पूरै जाब्तै सूं राखता गेडिय़ो ।
हैलो नीं सुणता
जद टाबरिया तो टिकांवता गेडिय़ो।
कोठै सूं बसाळी अर बसाळी सूं कोटड़ी
छोटी पड़ती जद बां रै हाथ लागतौ गेडिय़ो ।
चौकी माथै नीं चढ़ता डांगर अर गंडक
जद बै देखता दादो जी रै हाथ गेडिय़ो।
अब
कोनी दादो जी !
गेडिय़ो है
पण
पड़्यो है अलमारी रै लारे खूणै में लागयोड़ो
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