Saturday, 24 April, 2010

लोग तो उम्मीद पर जीते है

हमें तो जीने की भी उम्मीद नहीं

1 comment:

  1. हां ! इयां !
    कीँ न कीँ लिख
    लिखतां लिखतां
    ढाण घल जासी
    अर ऐक दिन
    लूंठो कवि बण जासी।

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